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चाय वाले ने जीत लिया सारा बागान


एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी को हिंदी पट्टी की पार्टी कहा जाता था. फिर 2008 में कर्नाटक की सत्ता तक पहुंचकर पार्टी ने यह धारणा तोड़ने की कोशिश की. इन चुनाव परिणामों से साफ़ हो गया है कि लोगों ने भाजपा के विकास के एजेंडे को स्वीकार किया है और वे इसका समर्थन भी करते हैं. भाजपा अब सिर्फ अपने पारंपरिक दायरों में सिमटी हुई पार्टी नहीं रही. अब वह अपने लिए नए-नए सियासी मैदान तैयार कर रही है. केंद्र में अपनी सरकार चला रही पार्टी के लिए ये चुनाव बेहद उत्साह बढ़ाने वाले रहे हैं.

भाजपा ने असम चुनाव केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनवाल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके लड़ा था. यह पहला मौका होगा कि पूर्वोत्तर के किसी राज्य में कोई भाजपा नेता मुख्यमंत्री बनेगा. भाजपा के पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके कुछ सहयोगी संगठन असम में सक्रिय तो रहे हैं लेकिन, यह सक्रियता कभी भी इतनी नहीं रही कि यहां भाजपा उस अंदाज में खड़ी हो पाती असम में पहली बार ऐसा होगा कि वहां भाजपा की सरकार होगी. भले ही 126 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा को अपने बूते बहुमत हासिल करने भर सीटें नहीं मिली हों लेकिन गठबंधन में सबसे अधिक सीटें भाजपा के पास हैं और मुख्यमंत्री भी उसी का होगा.

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने वही प्रयोग असम में दोहराया जो वे दूसरे राज्यों में करते आए हैं. यह प्रयोग था दूसरी पार्टियों से जीतने की क्षमता रखने वाले नेताओं को तोड़कर अपनी पार्टी में लाना और बेहद चतुराई से एक गठबंधन बनाना जिन दिनों असम चुनाव की तैयारियां चल रही थीं और कांग्रेस जैसी दूसरी पार्टियों से भाजपा में नेताओं का आयात किया जा रहा था.

असम पूर्वोत्तर भारत का पहला ऐसा राज्य होगा जहां भाजपा सहयोगी की भूमिका में नहीं बल्कि सरकार का नेतृत्व करेगी. माना जा रहा है कि असम में भाजपा की कामयाबी पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में उसके विस्तार को गति देने वाली साबित होगी. असम पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा राज्य है. ऐसे में भाजपा का यहां की सत्ता में आना पूर्वोत्तर भारत में उसकी मौजूदगी को मजबूत बनाने की अहम कड़ी साबित हो सकता है. पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य में एक विकल्प लोगों के सामने रखने के बाद भाजपा इस क्षेत्र के दूसरे राज्यों में इसका प्रचार करके अपनी सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर सकती है.

असम में लोकसभा की 14 सीटें हैं. 2014 में इनमें से सात सीटों पर भाजपा को जीत हासिल हुई थी. पूर्वोत्तर भारत से ऐसा नतीजा आना भाजपा के लिए बेहद उत्साहजनक था. हालांकि, उस वक्त इसका श्रेय नरेंद्र मोदी को दिया गया और कहा गया कि यह मोदी मैजिकका नतीजा है. लेकिन इस सबके बीच भाजपा को यह साफ तौर पर लग गया कि अगर यहां मेहनत की जाए और सोच-समझकर गठबंधन किया जाए तो पूर्वोत्तर में पहली बार भाजपा की सरकार बन सकती है.


हालांकि, असम की कामयाबी से राज्यसभा में भाजपा को कोई फायदा होने की उम्मीद हाल-फिलहाल नहीं है. पहली बार असम से कोई राज्यसभा की सीट 2019 में खाली होगी. यह नतीजे देखें तो कहा जा सकता है कि भाजपा ने अपने सियासी प्रभाव का छक्का हिंदी पट्टी की सीमा रेखा के पार मार दिया है.
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