भारतवर्ष में जो स्वयंभू गणेश जी के ऐसे प्रमुख चार स्थान सिद्धपुर सिहोर सिद्धिविनायक, उज्जैन के चिन्तामन गणेश जी, रंणथम्भौर संवाई माधोपुर राजस्थान के सिद्ध गणेश और सिद्धपुर गुजरात में महागणेश है। जिनमें से एक सीहोर में स्तिथ हैं। यहां साल भर लाखों श्रृद्धालु भगवान गणेश के दर्शन करने आते हैं। अपनी मन्नत के लिए उल्टा सातिया बनाकर जाते हैं।

सिद्धपुर को वर्तमान में सिहोर कहा जाता है। सिहोर जिले में जो कि भोपाल से 40 किमी दूर है, पश्चिम उत्तर में पार्वती नदी के किनारे में गोपालपुर गांव में मंदिर स्थित है। स्वयंभू प्रतिमा जमीन में आधी घंसी हुई है। जो कि श्याम वर्ण काले पत्थर की स्वर्ण के समान मूर्ति का रूप दर्शित होता है।  चिंतामन सिद्ध गणेश मंदिर 84 गणेश सिद्ध मंदिरों में से एक है।


2000 वर्ष पुराने मंदिर की ये है कहानी
चिंतामन गणेश मंदिर का इतिहास करीब दो हजार वर्ष पुराना है। कहते हैं कि सम्राट विक्रमादित्य सीवन नदी से कमल के फूल के रूप में प्रकट हुए। और भगवान गणेश को रथ में लेकर जा रहे थे। सुबह होते ही रथ जमीन में धंस गया और रथ में रखा कमल का फूल गणेश की मूर्ति के रूप में बदलने लगा। जिसके बाद मूर्ति जमीन में धंसने लगी। बाद में इस स्थान पर मंदिर बनवाया गया। आज भी यह प्रतिमा जमीन में आधी धंसी हुई है।

कहां है मंदिर
राजधानी भोपाल के निकट बसा सीहोर जिला। जिसके मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूरी पर चिंतामन गणेश मंदिर स्थित है। चिंतामन सिध्द गणेश को लेकर पौराणिक इतिहास है। जानकार बताते हैं कि चिंतामन सिद्ध भगवान गणेश की देश में चार स्वंयभू प्रतिमाएं हैं। इनमें से एक रणथंभौर सवाई माधोपुर (राजस्थान) दूसरी उगौन स्थित अवन्तिका, तीसरी गुजरात के सिद्धपुर में और चौथी सीहोर में चिंतामन गणेश मंदिर। इन चारों जगहों पर गणेश चतुर्थी पर मेला लगता है।

पेश्वा बाजीराव ने बनावाया था देवालय
इतिहासकरों की मानें तो करीब साढ़े तीन सौ साल पहले पेश्वा युध्दकाल के दरमयान पूर्व प्रतापी मराठा पेश्वा बाजीराव प्रथम ने अपने साम्राज्य बढ़ाने की योजना को लेकर पार्वती नदी के पार पड़ाव डालने का मन बनाया। लेकिन नदी का बहाव इतना तेज था कि बाजीराव की राज्य विस्तार की योजना अधर में चली गई। फिर पेश्वा बाजीराव नदी में उठे बहाव के थमने का इंतजार कर रहे थे इतने में पेश्वा को स्थानीय लोगों ने यहां पर विराजित भगवान गणेश के बारे में बताया। फिर यह जानकर पेश्वा बाजीराव में को रात में ही गणेश की प्रतिमा के दर्शन करने का मन हुआ। राजा मंत्री व सनिकों के साथ गणेश दर्शन के लिए रवाना हुए। 

लगभग दो हजार वर्ष पूर्व वर्तमान उज्जैन पूर्व नाम अंवतिका के परमार वंश के राजा विक्रमादित्य द्वारा विक्रम संवत 155 में मंदिर का निर्माण कराया गया था। बाद में लगभग 300 वर्ष पूर्व मंदिर का जीर्णोदार एवं सभा मंडल का निर्माण मराठा राजा पेशवा बाजीराव प्रथम द्वारा कराया गया। बाद में विक्रमादित्य के पश्चात् शलिवाहक शक, राजा भोज, कृष्णदेव राय, गौड़ राजा नवल शाह और नानाजी पेशवा विट्ठू वालो द्वारा तथा 1911 में बेगम सुल्तान जहां, 1933 में नबाब हमीदउल्लाखंा, भोपाल नबाब द्वारा मंदिर में पूजा व्यवस्था की जाती रही है।

वर्तमान मंदिर पेशवाकालीन श्रीयंत्र के कोण पर बना हैं। जिसमें गर्भगृह में भगवान शिव बिराजे है वहीं भव्य शिखर के साथ अंबिका मां दूसरे शिखर पर दुर्गा मां और मां शारदा आरूढ़ है। भगवान राधाकृष्णादि के साथ ही वैदिक मंगल कलश, उपर पवित्र सुन्दर सभा मंडप, नीचे सभा मंडप और परिक्रमा व्यवस्था है, बगल में विशाल वट वृक्ष पर अनेक देवी देवता विराजे है, वहीं पीछे शीतला माता भैरोनाथ सामने हनुमान जी का मंदिर है।

ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त परिक्रमा के पीछे पीठ पर उल्टा स्वास्तिक बनाकर अपनी मनौती मांगता है उनकी मनोकामाना भगवान गणेश शीघ्र ही पूर्ण करते है। मनोकामना पूर्ण होने पर भक्त अपनी श्रृद्धा और शक्ति से पान-प्रसाद चढ़ाते है, सच्ची श्रद्धा व भक्ति से जो भी भगवान श्री गणेश की शरण में आते है उनके मनोरथ अवश्य पूर्ण होते है।