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अपनी इस क्रांतिकारी खोज से चंडीगढ़ के अभिनव वर्मा न जाने कितने युवाओं को सीख दे दिए


21 वर्षीय अभिनव वर्मा ने बारहवीं कक्षा की पढाई करते हुए विकलांग लोगों की मदद करने की ठान ली थी. मैकेनिकल इंजीनियरिंग से बीटेक करते हुए द्वितीय वर्ष में ही उन्होंने अपने इस सपने को हकीकत में भी बदल दिया.

'लाइव ब्रेल' नाम के इस उपकरण को अंगूठी की तरह उंगली में पहनना होता है और हाथ की इस उंगली को चलते समय आगे की ओर रखना पड़ता है. यह पहनने वाले को वाइब्रेशन (कंपन) के जरिये रास्ते में आने वाली बाधाओं के बारे में बताता है. साथ ही यह सामने से आ रही वस्तु के आकर और उसकी गति के बारे में भी आभास करा देता है.

मात्र तीन ग्राम की यह डिवाइस सेकेण्ड के 50 वें हिस्से (1/50) के बराबर समय में ही सामने आने वाली बाधा पर प्रतिक्रिया दे देती है. इस उपकरण में दूरी का पता लगाने वाले दो अल्ट्रासॉनिक सेंसर लगे हैं. इनमें पहला सामने आने वाली बाधा (वस्तु) की गति के बारे में और दूसरा उसकी दूरी का पता लगाता है. इसे पहनने वाला व्यक्ति कंपन की तीव्रता से यह समझ सकता है कि रास्ते में आने वाली बाधा कितनी दूर है, कितनी बड़ी है और किस गति से उसकी ओर आ रही है. अभिनव की मानें तो यह उपकरण नेत्रहीन व्यक्ति को दस अलग-अलग तीव्रता के कंपनों से सामने आने वाली बाधा का आभास कराता है जिससे व्यक्ति को उसकी सही स्थिति का अंदाजा हो जाता है.

दरअसल, इसमें सैकड़ों ऑडियो बुक को रिकार्ड करने और सुनने की सुविधा दी गई है जो नेत्रहीनों के लिए एक तरह से संजीवनी का काम करता है. इसके अलावा इसमें एफएम रेडियो की सुविधा भी है. अगर इनकी बैटरी की बात करें तो यह एक बार चार्ज होने पर एक हफ्ते तक चलती है.

करीब तीन साल पहले 18 साल की उम्र में अभिनव ने जब इसे बनाया था तब यह उपकरण थोड़ा वजनी था. हालांकि उस समय भी इसे दस्तानों के रूप में हाथ में पहना जा सकता था. इसे ईजाद करने के बाद उन्होंने इसका पंजीकरण कराकर इसे 'इजी टू यूज़' बनाने पर काम किया. दो सालों में उन्होंने इसके वजन को घटाकर तीन ग्राम कर दिया और इसे एक उंगली में पहनने लायक बना दिया. दुनिया भर में सैकड़ों प्रयोगों से गुजरने के बाद इसी साल मार्च में इस डिवाइस को अभिनव की कंपनी 'एम्ब्रो एस' ने लांच किया है. यह डिवाइस दो वर्जन 'लाइव ब्रेल मिनी' और 'मिनी ई' के रूप में बाजार में उपलब्ध है. मिनी की कीमत 299 डॉलर और मिनी ई की कीमत 699 डॉलर रखी गई है. हालांकि, भारत में एक गैर सरकारी संगठन की मदद से यह केवल 6999 रुपए में ही उपलब्ध है.

अभिनव ने स्कूल के दिनों में ही यह ठान लिया था कि उन्हें दृष्टिहीन लोगों के लिए कोई ऐसा उपकरण इजाद करना है जो उनकी छड़ी छुड़वा सके और उन्हें भी आजादी का एहसास करा सके. उनके मुताबिक उन्हें सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते दृष्टिहीन लोगों को देखकर बहुत ज्यादा पीड़ा पहुंचती थी क्योंकि छड़ी की मदद से सीढ़ियों पर चढना और सड़क पार करना काफी ज्यादा मुश्किल काम है. अभिनव के मुताबिक दृष्टिहीनों की यह स्थिति उन्हें अंदर ही अंदर कचोटती थी. 

स्कूल स्तर पर हुई एक प्रतियोगिता में उन्हें विकलांग लोगों के लिए एक उपकरण बनाने की तरकीब सूझी. इसके कुछ साल बाद तकनीक की पढ़ाई करते हुए उन्होंने एक ऐसा उपकरण ईजाद कर दिया जिसे अभी तक पूरी दुनिया में दृष्टिहीनों के लिए बने उपकरणों में सबसे बेहतर माना जा रहा है.


अभिनव बताते हैं की लांच के तीन महीनों में ही उनकी इस डिवाइस ने सोलह देशों में अपनी पहुँच बना ली है. इस डिवाइस के बड़े खरीददारों में ब्रिटेन का 'रॉयल नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ ब्लाइंड पीपल' और 'अमेरिकन फेडरेशन ऑफ़ द ब्लाइंड' शामिल हैं. दुनियाभर के नेत्रहीनों का बड़ा सहारा बनी अभिनव की यह डिवाइस कई राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी है साथ ही उनकी इस खोज की सराहना पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं.
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